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Hindu New Year : हिन्दूओं का नववर्ष 9 अप्रैल से आरंभ हो रहा है, जानें गुड़ी पड़वा का महत्व

Posted on April 9, 2024 By Manish Srivastava No Comments on Hindu New Year : हिन्दूओं का नववर्ष 9 अप्रैल से आरंभ हो रहा है, जानें गुड़ी पड़वा का महत्व

हिन्दू नववर्ष (नवसंवत्) (गुड़ी पड़वा) 09 अप्रैल 2024 दिन मंगलवार से शुरू हो रहा है। इस विषय में विस्तृत जानकारी दे रहे हैं श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार वाले प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित ह्रदय रंजन शर्मा व्हाट्सएप नंबर-9756402981,7500048250

🌟गुड़ी पड़वा ‘हिन्दू नववर्ष’ के रूप में पूरे भारत में मनाई जाती है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को “गुड़ी पड़वा” या “वर्ष प्रतिपदा” या “उगादि” (युगादि) कहा जाता है। इस दिन सूर्य, नीम की पत्तियाँ, अर्ध्य, पूरनपोली, श्रीखंड और ध्वजा पूजन का विशेष महत्त्व होता है। माना जाता है कि चैत्र माह से हिन्दूओं का नववर्ष आरंभ होता है। सूर्योपासना के साथ आरोग्य, समृद्धि और पवित्र आचरण की कामना की जाती है। गुड़ी पड़वा के दिन घर-घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाई जाती है। उसे नवीन वस्त्राभूषण पहना कर शक्कर से बनी आकृतियों की माला पहनाई जाती है। पूरनपोली और श्रीखंड का नैवेद्य चढ़ा कर नवदुर्गा, श्रीरामचन्द्र एवं उनके भक्त हनुमान की विशेष आराधना की जाती है।

♦हिन्दू नववर्ष का प्रारम्भिक दिन’गुड़ी पड़वा’ के अवसर पर लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, द्वार पर रंगोली बनाते हैं और दरवाज़ों को आम की पत्तियों व गेंदे के फूलों से सजाते हैं। इस दिन घरों के आगे एक-एक ‘गुड़ी’ या झंडा रखा जाता है और उसके साथ स्वास्तिक चिह्न वाला एक बर्तन व रेशम का कपड़ा भी रखा जाता है। लोग पारम्परिक वस्त्र पहनते हैं। महिलाएँ नौ गज लम्बी साड़ी पहनती हैं। वैसे तो पौराणिक रूप से गुड़ी पड़वा का अलग महत्त्व है, लेकिन प्राकृतिक रूप से इसे समझा जाए तो सूर्य ही सृष्टि के पालनहार हैं। अत: उनके प्रचंड तेज को सहने की क्षमता पृ‍‍थ्वीवासियों में उत्पन्न हो, ऐसी कामना के साथ सूर्य की अर्चना की जाती है। इस दिन ‘सुंदरकांड’, ‘रामरक्षास्तोत्र’ और देवी भगवती के मंत्र जाप का विशेष महत्त्व है। हमारी भारतीय संस्कृति और ऋषियों-मुनियों ने ‘गुड़ी पड़वा’ अर्थात् चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से ‘नववर्ष’ का आरंभ माना है। ‘गुड़ी पड़वा’ पर्व धीरे-धीरे औपचारिक होती चली जा रही है, लेकिन इसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया है।




🔥अर्थ तथा महत्त्व
⭐’गुड़ी’ का अर्थ होता है- ‘विजय पताका’। कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसी दिन से नया संवत्सर भी प्रारम्भ होता है। अत: इस तिथि को ‘नवसंवत्सर’ भी कहते हैं। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इस प्रतिपदा तिथि को ‘प्रवरा’ अथवा ‘सर्वोत्तम तिथि’ कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र का घटस्थापन, ध्वजारोपण, वर्षेश का फल पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है।

🌺गुड़ी पड़वा का मुहूर्त
💥 चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो, उस दिन से नव संवत्सर आरंभ होता है।
💥 यदि प्रतिपदा दो दिन सूर्योदय के समय पड़ रही हो तो पहले दिन ही गुड़ी पड़वा मनाते हैं।
💥यदि सूर्योदय के समय किसी भी दिन प्रतिपदा न हो, तो तो नव-वर्ष उस दिन मनाते हैं जिस दिन प्रतिपदा का आरंभ व अन्त हो। अधिक मास होने की स्थिति में

🌷निम्नलिखित नियम के अनुसार गुड़ी पड़वा मनाते हैं।
🌟प्रत्येक 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के बाद वर्ष में अधिक मास जोड़ा जाता है। अधिक मास होने के बावजूद प्रतिपदा के दिन ही नव संवत्सर आरंभ होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक मास भी मुख्य महीने का ही अंग माना जाता है। इसलिए मुख्य चैत्र के अतिरिक्त अधिक मास को भी नव सम्वत्सर का हिस्सा मानते हैं।

♦गुडी पडवा की पूजा-विधि
निम्न विधि को सिर्फ़ मुख्य चैत्र में ही किए जाने का विधान है–
•🍁 नव वर्ष फल श्रवण (नए साल का भविष्यफल जानना)
•🍁 तैल अभ्यंग (तैल से स्नान)
•🍁 निम्ब-पत्र प्राशन (नीम के पत्ते खाना)
•🍁 ध्वजारोपण
•🍁 चैत्र नवरात्रि का आरंभ
•🍁 घटस्थापना

⭐संकल्प के समय नव वर्ष नामग्रहण (नए साल का नाम रखने की प्रथा) को चैत्र मास में ही शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जा सकता है। इस संवत्सर का नाम श्री कालयुक सिद्धार्थी है तथा वर्ष 2081है। साथ ही यह श्री शालीवाहन शकसंवत 1946 भी है और इस शक संवत का नाम श्री कालयुक सिद्धार्थी है।




🔥नव संवत्सर का राजा (वर्षेश)

💥नए वर्ष के प्रथम दिन के स्वामी को उस वर्ष का स्वामी भी मानते हैं। 2024 में हिन्दू नव वर्ष मंगलवार 09अप्रैल से आरंभ हो रहा है, अतः नए सम्वत् का इस बार राजा मंगल है और मंत्री शनि है।
🌟गुड़ी पड़वा के पूजन-मंत्र
🌷गुडी पडवा पर पूजा के लिए आगे दिए हुए मंत्र पढ़े जा सकते हैं। कुछ लोग इस दिन व्रत-उपवास भी करते हैं।पूजा के बाद व्रत रखने वाले व्यक्ति को इस मंत्र का जाप करना चाहिए–

🌺ॐ चतुर्भिर्वदनैः वेदान् चतुरो भावयन् शुभान्।
🌺ब्रह्मा मे जगतां स्रष्टा हृदये शाश्वतं वसेत्।।

🍁गुड़ी पड़वा मनाने की विधि
🌻1. प्रातःकाल स्नान आदि केबाद गुड़ी को सजाया जाता है। लोग घरों की सफ़ाई करते हैं। गाँवों में गोबर से घरों को लीपा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन अरुणोदय काल के समय अभ्यंग स्नान अवश्य करना चाहिए। सूर्योदय के तुरन्त बाद गुड़ी की पूजा का विधान है। इसमें अधिक देरी नहीं करनी चाहिए।

🌻2. चटख रंगों से सुन्दर रंगोली बनाई जाती है और ताज़े फूलों से घर को सजाते हैं।

🌻3. नए व सुन्दर कपड़े पहनकर लोग तैयार हो जाते हैं। आम तौर पर मराठी महिलाएँ इस दिन नौवारी (9 गज लंबी साड़ी) पहनती हैं और पुरुष केसरिया या लाल पगड़ी के साथ कुर्ता-पजामा या धोती-कुर्ता पहनते हैं।

🌻4. परिजन इस पर्व को इकट्ठे होकर मनाते हैं व एक-दूसरे को नव संवत्सर की बधाई देते हैं।

🌻5. इस दिन नए वर्ष का भविष्यफल सुनने-सुनाने की भी परम्परा है।

🌻6. पारम्परिक तौर पर मीठे नीम की पत्तियाँ प्रसाद के तौर पर खाकर इस त्यौहार को मनाने की शुरुआत की जाती है। आम तौर पर इस दिन मीठे नीम की पत्तियों, गुड़ और इमली की चटनी बनायी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इससे रक्त साफ़ होता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसका स्वाद यह भी दिखाता है कि चटनी की ही तरह जीवन भी खट्टा-मीठा होता है।

🌻7. गुड़ी पड़वा पर श्रीखण्ड, पूरन पोळी, खीर आदि पकवान बनाए जाते हैं।

🌻8. शाम के समय लोग लेज़िम नामक पारम्परिक नृत्य भी करते हैं।

💥गुड़ी कैसे लगाएँ
🔷1. जिस स्थान पर गुड़ी लगानी हो, उसे भली-भांति साफ़ कर लेना चाहिए।
🔷2. उस जगह को पवित्र करने के लिए पहले स्वस्तिक चिह्न बनाएँ।
🔷3. स्वस्तिक के केन्द्र में हल्दी और कुमकुम अर्पण करें।




⭐विभिन्न स्थलों में गुड़ी पड़वा आयोजन
🌷देश में अलग-अलग जगहों पर इस पर्व को भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है।
♦1. गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे संवत्सर पड़वो नाम से मनाता है।
♦2. कर्नाटक में यह पर्व युगाड़ी नाम से जाना जाता है।
♦3. आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में गुड़ी पड़वा को उगाड़ी नाम से मनाते हैं।
♦4. कश्मीरी हिन्दू इस दिन को नवरेह के तौर पर मनाते हैं।
♦5. मणिपुर में यह दिन सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा कहलाता है।
♦6. इस दिन चैत्र नवरात्रि भी आरम्भ होती है।

🍁इस दिन महाराष्ट्र में लोग गुड़ी लगाते हैं, इसीलिए यह पर्व गुडी पडवा कहलाता है। एक बाँस लेकर उसके ऊपर चांदी, तांबे या पीतल का उलटा कलश रखा जाता है और सुन्दर कपड़े से इसे सजाया जाता है। आम तौर पर यह कपड़ा केसरिया रंग का और रेशम का होता है। फिर गुड़ी को गाठी, नीम की पत्तियों, आम की डंठल और लाल फूलों से सजाया जाता है।गुड़ी को किसी ऊँचे स्थान जैसे कि घर की छत पर लगाया जाता है, ताकि उसे दूर से भी देखा जा सके। कई लोग इसे घर के मुख्य दरवाज़े या खिड़कियों पर भी लगाते हैं।

🌸गुड़ी का महत्व
🔥 कहा जाता है कि चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में अवतार लिया था। सूर्य में अग्नि और तेज हैं, चन्द्रमा में शीतलता। शान्ति और समृद्धि का प्रतीक सूर्य और चन्द्रमा के आधार पर ही सायन गणना की उत्पत्ति हुई है। इससे ऐसा सामंजस्य बैठ जाता है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास आदि व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते। तिथि घटे या बढ़े, लेकिन ‘सूर्य ग्रहण’ सदैव अमावस्या को होगा और ‘चन्द्र ग्रहण’ सदैव पूर्णिमा को ही होगा।

🔥 यह भी मान्यता है कि ब्रह्मा ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही सृष्टि की रचना की थी। विष्णु भगवान ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही प्रथम जीव अवतार (मत्स्यावतार) लिया था।माना जाता है कि शालिवाहन ने शकों पर विजय आज के ही दिन प्राप्त की थी। इसलिए ‘शक संवत्सर’ प्रारंभ हुआ।

🔥 मराठी भाषियों की एक मान्यता यह भी है कि मराठा साम्राज्य के अधिपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही ‘हिन्दू पद पादशाही’ का भगवा विजय ध्वज लगाकर हिन्दू साम्राज्य की नींव रखी थी।

🔥 चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएँ फलते-फूलते हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है।

🔥 कई लोगों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (गुडियाँ) फहराए। आज भी घर के आँगन में गुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को ‘गुड़ी पडवा’ नाम दिया गया। महाराष्ट्र में इस दिन पूरनपोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें जो चीजें मिलाई जाती हैं, वे हैं- गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम। गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होती है।

🔥 ‘नवसंवत्सर’ प्रारम्भ होने पर भगवान की पूजा करके प्रार्थना करनी चाहिए- “हे भगवान! आपकी कृपा से मेरा वर्ष कल्याणमय हो, सभी विघ्न बाधाएँ नष्ट हों। दुर्गा की पूजा के साथ नूतन संवत्‌ की पूजा करें। घर को वन्दनवार से सजाकर पूजा का मंगल कार्य संपन्न करें। कलश स्थापना और नए मिट्टी के बरतन में जौ बोएँ और अपने घर में पूजा स्थल में रखें। स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए नीम के पेड़ की कोंपलों के साथ मिस्री खाने का भी विधान है। इससे रक्त से संबंधित बीमारी से मुक्ति मिलती है।

🔥 गुड़ी को धर्म-ध्वज भी कहते हैं; अतः इसके हर हिस्से का अपना विशिष्ट अर्थ है–उलटा पात्र सिर को दर्शाता है जबकि दण्ड मेरु-दण्ड का प्रतिनिधित्व करता है।

🔥 किसान रबी की फ़सल की कटाई के बाद पुनः बुवाई करने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाते हैं। अच्छी फसल की कामना के लिए इस दिन वे खेतों को जोतते भी हैं।

🙏श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भण्डार पंडित हृदय रंजन शर्मा की ओर से आप सभी सनातन धर्म प्रेमियों को भारतीय (हिन्दू) नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं




💥प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदय रंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार पुरानी कोतवाली सर्राफा बाजार अलीगढ़ यूपी व्हाट्सएप नंबर-9756402981,7500048250

धर्म अध्यात्म Tags:गुड़ी पड़वा, हिन्दू नववर्ष

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