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Rishi Panchami 28 August : ऋषि पंचमी का व्रत, कथा और पूजन विधि जानें

Posted on August 23, 2025August 23, 2025 By Manish Srivastava No Comments on Rishi Panchami 28 August : ऋषि पंचमी का व्रत, कथा और पूजन विधि जानें

अलीगढ़ :  ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) 28 अगस्त दिन गुरुवार को है। इस दिन व्रत, कथा और पूजन का विशेष महत्‍व है। इस विषय में विस्‍तार से जानकारी दे रहे हैं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदयरंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान।

ऋषिपंचमी का त्यौहार हिन्दू पंचांग के भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाया जाता है। यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन होता है। भादों शुक्ल पंचमी के व्रत को ऋषि पंचमी व्रत कहते हैं .इसको स्त्री -पुरुष सभी पापों की निवृत्ति के लिए करते हैं .नियम पूर्वक व्रत तथा पूजन करनेसेसर्वमुख ,आरोग्यता ,समृद्धि ,यश ,धन धान्य ,संतान ,बैभव तथा विजय की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष मिलता है।




ऋषिपंचमी व्रत का विधान
व्रत वाले दिन ब्रह्ममुहर्त में उठकर किसी नदी या जलाशय में स्नान करें। जब स्नान करके पवित्र हो जाएँ तो रेशमी वस्त्र धारण करें। मन में व्रत का निश्चय करके आँगन में बेदी बनाकर शुद्ध मन से पंचामृत तैयार करें। तब अरुंधती सहित सप्त ऋषियों को उस पंचामृत में स्नान करावें।
फिर शुद्ध वस्त्र से उनको सुखाकर उनके आसन पर विराजमान करें । तब सप्तऋषियों के निमित्त चन्दन ,अगर ,कपूर आदि गंध देवे ,फूल चढ़ाएं और उनके सम्मुख दीपक जलाकर हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करे कि आप मुझ पर कृपा करें और मेरे द्वारा निवेदित इस पूजा को स्वीकार करें .भगवान् को भोग लगाकर प्रसाद समस्त बन्धु बांधव कथा सुन्ने वाले में बाँटें

ऋषिपंचमी व्रत की कथा
एक समय राजा धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से ब्रह्मा जी के समीप गए और उनके चरणों में शीश नवा कर बोले – हे आदिदेव ! आप समस्त धर्मों के प्रवर्तक और गूढ़ धर्मों के जानने वाले हो .आपके मुख से धर्म चर्चा श्रवण कर मन को महान शांति मिलती है .भगवान् के चरण कमलों में प्रीति बढ़ती है ,वैसे तो आपने मुझे नाना प्रकार के व्रतों के विषय पर उपदेश दिए हैं।

राजा सुताश्व ने कहा कि हे पितामह! मुझे ऐसा व्रत बताइये जिससे समस्त पापों का नाश हो जाये। तब ब्रह्माजी ने कहा-राजन मैं तुम्हें वह व्रत बताता हूँ जिससे समस्त पाप विनाश को प्राप्त होंगे, यह ऋषिपंचमी का व्रत है जिसके करने से नारी जाति के तमाम पाप दूर होकर पुण्य की भागी होती है। इसके लिए तुमसे एक पुरातन कथा कहता हूँ कि विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक सदाचारी ब्राह्मण निवास करते थे।

उनकी पतिव्रता नारी सुशीला से एक पुत्री और एक पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया गया, पर विधि के विधान से वह कन्या विधवा हो गई, तो वह अपने सतीत्व की रक्षा पिता के घर रह करके करने लगी।

एक दिवस कन्या माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी तो, रात भर में उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गए, सुबह जब कुछ शिष्यों ने उस कन्या को अचानक इस दशा में देख उसकी माता सुशीला को निवदेन किया कि माता गुरू पुत्री के दुःख को देखिये। गुरु पत्नी ने जाकर पुत्री को देखा और उसे अपनी पुत्री की अचानक यह दशा देखके नाना तरह से विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई।

ब्राह्मण भी पुत्री की दशा देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए, और दुखी हुए, तब ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा, महाराज!क्या कारण है कि इस पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए? तब महाराजा ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि इस पुत्री ने जो सात जन्म पहिले ब्राह्मणी थी।




ऋषि पंचमी व्रत

तो एक दिन रजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री छु ली और ऋषिपंचमी व्रत को भी अनादर से देखा, उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए क्योंकि रजस्वला ( रजोधर्म) वाली नारी प्रथम दिन चांडालनी के बराबर व दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान व तीसरे दिन धोबिन के समान शास्त्र दृष्टि से मानी जाती है।

तुम्हारी कन्या ने ऋषिपंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये इससे ब्राह्मण कुल में जन्म तो हुआ, पर शरीर में कीड़े पड़ गए हैं ।तब सुशीला ने कहा, महाराज ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे संसार के प्राणीमात्र इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले हे सहधर्मिणी! यह व्रत भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है।

पंचमी के दिन पवित्र नदी में स्नान कर व्रत धारण कर सायंकाल सप्तऋषियों का पूजन विधान से करना चाहिए, भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीप के उस पर अष्ट कमल दल बनाकर नीचे लिखे सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए।
महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ महर्षियों की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत को करके उद्यापन की विधि भी करनी चाहिए। चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके पंचमी के दिन व्रत आरम्भ करे, सुबह नदी या जलाशय में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बना कर।
उस पर कलश स्थापन करे। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बांधकर पूजासामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल्लू पर सप्तऋषियों की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें फिर घोड़षोपचार से पूजन कर रात्रि को पुराण का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर संतुष्ट करें।
इस प्रकार इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यवती होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है

द्वितीय कथा
दूसरी कथा भविष्य पुराण में इस प्रकार आती है कि एक बार महाराज कृष्ण से महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि वह कौन पंचमी है जिसके करने से नारी जाति दोष से मुक्त हो करके महत् पुण्य को प्राप्त होती है आप मुझे संक्षेप में श्रवण कराइए
तब भगवान कृष्णजी ने कहा, राजन! भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की पंचमी को ऋषि का व्रत रहने से नारी रजस्वला से मुक्त होती है क्योंकि जब इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा था, तब ब्रह्महत्या का एक भाग नारी के रज में, दूसरा नदी के फेन में, तीसरा भाग पर्वतों, चौथा भाग अग्नि की प्रथम ज्वाला में विभक्त किया था
इससे हर जाति की नारी रजस्वला होने पर प्रथम दिन चाँडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन की तरह दोषी होती है। इससे उस दिन प्रति वस्तु छूने से अपवित्र होकर दोष होता है। इस ऋषिपंचमी व्रत के करने से यह दोष मुक्त होकर नारी पवित्रता को प्राप्त होती हे

हे राजन! विदर्भ देश में एक श्येनजित नाम का राजा था, और उसी राज में एक सुमित्र नाम का विद्वान ब्राह्मण था, उसकी पत्नी का नाम जयश्री था। एक दिन वह रसोई घर में रजस्वला धर्म को प्राप्त हो गई, और वह समयानुसार भोजन आदि वस्तु छूती रही, इस प्रकार समय पाकर दोनों पति पत्नी की मृत्यु हो गई। मरने पर ब्राह्मणी का कुतिया का जन्म हुआ, और ब्राह्मण को बैल का जन्म लेना पड़ा
पर दोनों को अपने तप के प्रभाव से पूर्व जन्म की बातों का स्मरण बना रहा और यह दोनों प्राणी अपने ही पुत्र के घर में पुनः | जन्मे। एक दिन पितृ पक्ष में ब्राह्मण कुमार ने अपने पिता की श्राद्ध तिथि में विधि के साथ ब्राह्मण भोज रखा और अपनी पत्नी से स्वादिष्ट पकवान खीर आदि बनवाकर तैयार की। भाग्यवश एक साँप ने उस खीर में जहर उगल दिया।

यह हाल वह ब्राह्मणी कुतियां बनी देख रही थी, तो उसने सोचा कि अगर ब्राह्मण खायेंगे तो मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे, इससे मेरे लड़के को हत्याओं का भारी पाप लगेगा इससे उस खीर को कुतिया ने जान बूझ कर जूठी कर दी, उस बहू ने कुतिया को इतनी मार मारी कि उसकी कमर तोड़ दी और खीर फेंक कर दूसरी बना ली, फिर श्राद्ध कर सब ब्राह्मणों को भोजन कराया।

रात को कुतिया ने जाकर अपने पूर्व पति बैल से दिन में होने वाली सारी घटना बताई, तो बैल बोला-प्रिये! तुम्हारे पाप के संसर्ग से आज मुझे बैल होना पड़ा, और आज मेरे लड़के ने दिन भर मेरा मुँह बाँधकर जोता है और अभी तक एक मुट्ठी घास भी नहीं डाली, यह सारी बातें वह ब्राह्मण बालक भी सुनता रहा। जिससे वह बड़ा दुःखी हुआ। माता पिता को भोजन देकर वह दुःखित मन से चला गया।




उधर ऋषियों को दंडवत करके पूछा, महाराज, मेरे माता पिता कुतिया व बैल की योनि में हैं। वह किस प्रकार इस योनि से छुटकारा पा सकेंगे तो ऋषियों ने बताया तुम्हारे माता पिता ने रजोधर्म दोष से कुतिया व बैल का जन्म पाया है। इससे तुम घर जाकर विधि से उत्तम व्रत ऋषिपंचमी का करके उसका फल अपने माँ बाप को समर्पण करो, जिससे वह पशु योनि से मुक्त होकर स्वर्ग प्राप्त करें।

मुनियों से विधि सुनकर ब्राह्मण पुत्र ने घर आकर विधि के साथ सर्वान्न सहित भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत किया और श्रद्धा से उस व्रत का फल उन अपने माता पिता को समर्पण किया जिसके | प्रभाव से वे इस क्रूर योनि से छूटकर दिव्य देव विमान पर आरुढ़ हो स्वर्ग को प्राप्त हुए।

हे राजन! जो स्त्री इस व्रत को विधि के साथ करती है तथा श्रद्धा से सप्तऋषियों का पूजन करे वह नारी भयंकर दोष से छूटकर शीघ्र ही धन, पुत्र पौत्र आदि सुख सौभाग्य रूप को पाती है। इस व्रत को करना नारी जाति का मुख्य कर्तव्य है। इससे मन, शरीर आदि दोष मुक्त होते हैं। जो फल तीर्थों के करने से प्राप्त होते हैं वे इस व्रत से अनायास नारी जाति को मिलते हैं

ऋषि पंचमी की आरती

जय जय ऋषि राजा ,प्रभु जय जय ऋषि राजा।
देव समाजाहृत मुनि , कृत सुरगया काजा।।
जय दध्यगाथ वर्ण ,भारद्वाज गौतम ।

जय श्रृंगी ,पराशर अगस्त्य मुनि सत्तम।।
वशिष्ठ ,विश्वामित्र ,गिर ,अत्री जय जय ।
कश्यप भृगु प्रभृति जय ,जय कृप तप संचय ।।
वेद मन्त्र दृष्टावन ,सबका भला किया ।
सब जनता को तुमने वैदिक ज्ञान दिया ।।
सब ब्राह्मण जनता के मूल पुरुष स्वामी ।
ऋषि संतति ,हमको ज्ञानी हों सत्पथगामी ।।
हम में प्रभु आस्तिकता आप शीघ्र भर दो ।
शिक्षित सारे नर हो ,यह हमको वर दो ।।
धरणीधर कृत ऋषि जन की आरती जो गावे।
वह नर मुनिजन ,कृपया सुख संपत्ति पावे।।




अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें

🌸प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदय रंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार पुरानी कोतवाली सर्राफा बाजार अलीगढ़ यूपी व्हाट्सएप नंबर-9756402981,7500048250

धर्म अध्यात्म Tags:Rishi Panchami, ऋषि पंचमी

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